मानव और प्रकृति का ऐतिहासिक सम्बन्ध

 


प्रकृति और मानव

मानव और प्रकृति का ऐतिहासिक सम्बन्ध

प्राकृतिक दुनिया और मानव के बीच संबंध केवल आज का विषय नहीं है; यह इतिहास के प्रारंभ से ही चलता आ रहा है। प्रारंभिक मानव, जो लाखों साल पहले धरती पर विचरता था, उसकी जीविका पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर थी। वह जंगलों में रहने वाले पशुओं से सीखता था, नदियों से पानी लेता था, और सूरज और चंद्रमा के अनुसार समय और ऋतुओं का ज्ञान प्राप्त करता था।प्राचीन सभ्यताओं—जैसे सिंधु घाटी, मिस्र, मेसोपोटामिया—में भी प्रकृति का सम्मान प्रमुख था। नदियाँ जीवन का आधार थीं, वनों से भोजन और औषधियाँ मिलती थीं, और सूरज व वर्षा को देवता के रूप में पूजा जाता था। मानव ने प्रकृति से केवल भौतिक लाभ ही नहीं लिया, बल्कि उसकी शक्तियों और नियमों को समझकर अपने समाज और संस्कृति का निर्माण किया।जैसे-जैसे सभ्यता विकसित हुई, मानव ने तकनीक और औद्योगिकीकरण की ओर बढ़ना शुरू किया। यह विकास प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने की क्षमता को चुनौती देने लगा। जंगल काटे गए, नदियों को प्रदूषित किया गया, और वायुमंडलीय संतुलन बिगड़ा। इससे स्पष्ट होता है कि मानव और प्रकृति का संबंध केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और नैतिक भी है।

प्रकृति: जीवन की आधारशिला

मनुष्य के लिए जीवन संभव होने के लिए प्रकृति अनिवार्य है। जल, वायु, मिट्टी, भोजन—ये सभी केवल प्राकृतिक संसाधनों से ही प्राप्त होते हैं। यदि एक भी तत्व अनुपस्थित हो, तो जीवन की संभावना समाप्त हो जाती है।

जल: जल न केवल प्यास बुझाने का साधन है, बल्कि यह कृषि, उद्योग और जैविक प्रक्रियाओं के लिए भी आवश्यक है।

वायु: शुद्ध वायु के बिना जीवन असंभव है। वायु में मौजूद ऑक्सीजन और प्राकृतिक गैसों का संतुलन जीवन का आधार है।

मिट्टी: कृषि और भोजन का स्रोत, मनुष्य और जीव-जंतुओं के अस्तित्व के लिए अनिवार्य।वनस्पतियाँ और जीव-जंतु: संतुलित पारिस्थितिकी तंत्र बनाए रखने में मदद करते हैं।इसलिए कहा जा सकता है कि मानव की सभी भौतिक आवश्यकताओं का स्रोत केवल प्रकृति ही है। जब मानव प्रकृति के नियमों का सम्मान करता है, तब उसका जीवन स्थायी और सुरक्षित होता है।

मनुष्य और प्राकृतिक संतुलन

प्रकृति अपने नियमों के माध्यम से जीवन को नियंत्रित करती है। यदि हम इसे समझें और उसके अनुसार कार्य करें, तो मानव समाज और जीवन में स्थायित्व आता है। प्राकृतिक संतुलन का अर्थ केवल पर्यावरणीय संतुलन नहीं है, बल्कि इसमें मानव समाज, मानसिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक संतुलन भी शामिल है।

सामाजिक संतुलन: प्राकृतिक संसाधनों का समान वितरण समाज में सहयोग और शांति बनाए रखता है।मानसिक संतुलन: प्राकृतिक वातावरण में समय बिताने से मानसिक तनाव कम होता है और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।आध्यात्मिक संतुलन: प्राकृतिक चक्र और नियमों के प्रति सम्मान भाव आध्यात्मिक जागरूकता को बढ़ाता है।

प्रकृति से सीखने योग्य मूल्य

प्रकृति केवल संसाधनों का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन के मूल्य सिखाने वाली गुरु भी है। प्राकृतिक घटनाओं और जीव-जंतुओं के व्यवहार से मनुष्य कई मूल्य सीख सकता है:सहनशीलता: पेड़-पौधे कठोर परिस्थितियों में भी जीवन बनाए रखते हैं।संतुलन: जंगल और महासागर के पारिस्थितिकी तंत्र में हर जीव का स्थान और भूमिका संतुलित होती है।सहयोग: झुंड में रहने वाले जानवर और परागण में लगे मधुमक्खियाँ सहयोग का उदाहरण हैं।धैर्य और स्थायित्व: प्राकृतिक बदलाव धीरे-धीरे होते हैं, यह हमें जीवन में धैर्य रखने की सीख देता है।

मानव का दायित्व: संरक्षण और सम्मान

मानव का सबसे बड़ा कर्तव्य है कि वह प्रकृति का सम्मान करे और उसका संरक्षण करे। जब मानव केवल अपने लाभ के लिए प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करता है, तो वह संतुलन बिगाड़ देता है। यह न केवल प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ाता है, बल्कि मानव जीवन को भी अस्थिर करता है।वृक्षारोपण: पेड़ जीवन और हवा के लिए अनिवार्य हैं।जल संरक्षण: नदियों और जल स्रोतों का संरक्षण मानवता के भविष्य के लिए आवश्यक है।प्रदूषण नियंत्रण: वायु, जल और भूमि का प्रदूषण रोकना मानव जीवन के लिए अनिवार्य है।

आधुनिक जीवन में प्रकृति का महत्व

आज का मानव तकनीक और शहरों की भागदौड़ में प्रकृति से दूर हो गया है। अधिकांश लोग प्राकृतिक परिवेश में समय बिताने का महत्व नहीं समझते। इसका परिणाम मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक व्यवहार और जीवन संतुलन में असंतुलन के रूप में सामने आता है।इसलिए आवश्यक है कि आधुनिक जीवन में भी प्रकृति को केंद्र में रखा जाए। उदाहरण के लिए:शहरों में हरित क्षेत्र और पार्कों का निर्माण,प्राकृतिक ऊर्जा का उपयोग जैसे सौर और पवन ऊर्जा,स्थायी कृषि और पानी का संरक्षण,वैश्विक दृष्टि: मानवता और प्रकृति

मानव और प्रकृति का संतुलन केवल किसी एक देश का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह पूरी पृथ्वी के लिए आवश्यक है। वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का क्षरण और प्राकृतिक आपदाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि प्रकृति के साथ असंतुलित संबंध मानवता के लिए खतरा बन सकते हैं।इसलिए हर व्यक्ति, समाज और देश को यह समझना होगा कि प्राकृतिक संसाधनों का सही और संतुलित उपयोग ही भविष्य की सुरक्षा है।

संक्षेप में:भाग 2 में हमने मानव और प्रकृति के ऐतिहासिक और वर्तमान संबंध, प्राकृतिक संतुलन, जीवन के लिए प्रकृति का महत्व, मानव के दायित्व और वैश्विक दृष्टि पर चर्चा की है। इस भाग का उद्देश्य यह है कि पाठक समझें कि प्रकृति केवल जीवन का आधार नहीं, बल्कि जीवन जीने का मार्गदर्शक भी है।

“यह अंश हमारी पुस्तक सर्व साम्य अद्वैत प्रकृति चेतनवाद दर्शन — भाग 1 : नव सवित तत्व प्रकृतिवाद से लिया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता की स्थापना करके विश्व में शांति स्थापित करना है, ताकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों के जीवन में शांति बनी रहे, मनुष्य के जीवन में भी संतुलन और सौहार्द रहे, तथा सभी मनुष्य आपस में मिल-जुलकर अपने विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकें। हमारी प्रकृति से प्रार्थना है कि धरती पर स्थित प्रत्येक जीव सुखी रहे, स्वस्थ रहे।” आप भी चाहते हैं विश्व में शांति तो हमसे संपर्क करें।

जीमेल-: cosmicadvaiticconsciousism@gmail.com

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