दर्शन एक शब्द है, जिसका अर्थ अत्यंत व्यापक है, और जिसका भावार्थ इतना विशाल है कि पूरा ब्रह्मांड इसमें समा जाए। दर्शन केवल एक शब्द नहीं है; यह जीवन की व्याख्या है, क्योंकि जीवन ही दर्शन है और दर्शन ही जीवन है — दोनों में कोई भेद नहीं है। साधारण रूप में दर्शन ज्ञान का प्रतीक माना जाता है, परंतु वास्तविकता में दर्शन जीवन का प्रतीक है। जीवन ही दर्शन को जन्म देता है। जीवन की व्याख्या ही दर्शन है। जीवन और दर्शन दोनों समानांतर चलते हैं। जहाँ जीवन है, वहाँ दर्शन है; बिना जीवन के दर्शन संभव ही नहीं।दर्शन को जानने और समझने के लिए हमें जीवन को जानना और समझना होगा कि जीवन क्या है। जिसने जीवन को समझ लिया, मानो उसने दर्शन को समझ लिया। यहाँ यह प्रश्न उठता है कि दर्शन का जीवन से क्या संबंध है? दोनों एक कैसे हो सकते हैं, जबकि दर्शन तो एक विचारधारा है और जीवन का अर्थ एवं परिभाषा दर्शन से बिल्कुल अलग प्रतीत होती है। अब तक इन दोनों में कोई समानता सिद्ध नहीं हुई है — जीवन अलग है, दर्शन अलग है।यह भी कहा जाता है कि सभी जीवों के पास समान जीवन है, परंतु दर्शन केवल मनुष्य की विचारधारा है। मनुष्य के अतिरिक्त किसी अन्य जीव की कोई विचारधारा नहीं होती। ऐसे में यह कैसे उचित कहा जा सकता है कि जीवन ही दर्शन है? यदि ऐसा माना जाए, तो धरती का प्रत्येक जीव दार्शनिक माना जाएगा और प्रत्येक जीव का अपना दर्शन होना चाहिए। किंतु अभी तक यह सिद्ध नहीं हुआ है कि मनुष्य के अलावा धरती के किसी अन्य जीव की अपनी कोई विचारधारा है।
विज्ञान भी इस बात से सहमत नहीं है कि मनुष्य के अतिरिक्त किसी जीव में विचारधारा विद्यमान है, क्योंकि किसी भी जीव के पास अपने विचार व्यक्त करने के लिए कोई सुसंगठित भाषा नहीं है। इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि जीवन और दर्शन अलग-अलग हैं, या यह कहा जा सकता है कि जीव में जीवन तो है परंतु दर्शन नहीं।विज्ञान यह भी मानता है कि सभी जीव एक-दूसरे से संवाद करते हैं, चाहे वे पेड़-पौधे ही क्यों न हों। ऐसे में यह कहना कि उनके पास कोई भाषा नहीं है—संगत नहीं। बिना भाषा के संवाद कैसे संभव है? मनुष्य भी कई बार बिना भाषा का प्रयोग किए अपने भावों से बहुत कुछ व्यक्त कर देता है। अतः यह कहा जा सकता है कि संवाद के लिए भाषा अनिवार्य नहीं है; भाषा केवल संवाद का एक माध्यम है। भाषा के अतिरिक्त भी संवाद के अनेक साधन हैं। मनुष्य के पास भाषा है, इसीलिए वह आसानी से संवाद कर पाता है, परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि जिनके पास भाषा नहीं है, वे संवाद नहीं करते।
भाषा हमारे विचारों को व्यक्त करने का एक माध्यम है, परंतु यह नहीं कहा जा सकता कि जानवरों और पक्षियों की कोई भाषा नहीं होती। उनकी अपनी अलग भाषा होती है, जिसके माध्यम से वे संवाद करते हैं। किंतु पेड़-पौधों की कोई भाषा प्रतीत नहीं होती, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि वे संवाद नहीं करते। पेड़-पौधे भी संवाद करते हैं और एक-दूसरे के साथ जानकारी साझा करते हैं, तथा यह तथ्य विज्ञान द्वारा प्रमाणित हो चुका है।इसका सरल अर्थ यह है कि जहाँ जीवन है, वहाँ संवाद है; जहाँ संवाद है, वहाँ ज्ञान है। और ज्ञान ही दर्शन है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि धरती के सभी जीवों के पास अपना-अपना दर्शन विद्यमान है। अर्थात जीवन ही दर्शन है। मनुष्य के पास भाषा है, जिसके माध्यम से वह अपने विचारों को व्यक्त करता है, और दूसरा मनुष्य उन विचारों को सुनकर समझने का प्रयास करता है। परंतु जिन जीवों के पास भाषा नहीं है, उनका संवाद हम कैसे जानें? यह जानने के लिए हमें उनकी प्रकृति के समीप जाना होगा, उन्हें समझना होगा, और ध्यानपूर्वक अवलोकन करना होगा। तब हमें यह ज्ञात होगा कि पेड़-पौधे भी संवाद करते हैं।हमारा तात्पर्य यह है कि प्रत्येक जीव, जिसके पास जीवन है, उसके पास अपना एक दर्शन है। प्रत्येक जीव का स्वयं का दर्शन है। यह आज तक सिद्ध नहीं हुआ है, परंतु आने वाले वर्षों में हम सिद्ध कर देंगे कि प्रत्येक जीव का अपना दर्शन है।मानव जीवन को आधार मानकर भी देखें तो यह सिद्ध नहीं हुआ है कि हर मनुष्य दार्शनिक है। मानव के धरती पर प्रादुर्भाव से लेकर आज तक संपूर्ण मानव आबादी का एक प्रतिशत हिस्सा भी दार्शनिक नहीं रहा, अथवा यह कहा जा सकता है कि एक प्रतिशत से भी कम लोगों की विचारधारा दार्शनिक रही है। ऐसे में यह कैसे माना जाए कि मानव जीवन और दर्शन दोनों एक हैं? इन प्रश्नों के उत्तर जानने और यह समझने के लिए कि जीवन और दर्शन एक ही हैं, हमें पहले यह समझना होगा कि जीवन क्या है। तभी हम यह जान सकेंगे कि दोनों में समानताएँ क्या हैं और कितनी हैं। तभी हम किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाएँगे और यह सिद्ध कर सकेंगे कि जीवन और दर्शन दोनों एक हैं।जीवन क्या है? जीवन केवल एक शब्द मात्र नहीं है, जिसका अर्थ साधारण हो। जीवन का अर्थ जन्म से मृत्यु तक की कथा नहीं है कि व्यक्ति जन्मा और एक निश्चित आयु के बाद मर गया। जन्म और मृत्यु के मध्य का समय ही जीवन है—हम सामान्यतः ऐसा ही मानते हैं, क्योंकि इसके अतिरिक्त हमारे पास जीवन की कोई दूसरी अवधारणा नहीं है।
हम यह मानते हैं कि हमारे पास शरीर है, जो कार्य करता है, इसलिए हमारे पास जीवन है। मृत्यु होने पर जीवन समाप्त हो जाता है। यही अवधारणा विश्वभर में प्रचलित है कि मृत्यु के बाद जीवन समाप्त हो जाता है। परंतु ऐसा होता नहीं है। जीवन कभी समाप्त नहीं होता; जीवन शाश्वत सत्य है, जो कभी नहीं मरता।
जब तक हमें जीवन दिखाई देता है, महसूस होता है, तब तक हमें लगता है कि जीवन है। परंतु यह अलग बात है कि हमें जीवन कब तक दिखाई देता है। जब हम नहीं थे, तब भी जीवन था, तभी तो हमें जीवन मिला। जब हम नहीं रहेंगे, तब भी जीवन रहेगा। इसीलिए शरीर की मृत्यु होती है; शरीर की मृत्यु के बाद भी जीवन विद्यमान रहता है, क्योंकि जीवन कभी समाप्त नहीं होता। जीवन की कोई आयु नहीं होती, अतः जीवन की मृत्यु भी नहीं होती। शरीर की आयु निश्चित होती है, इसलिए शरीर एक समय के बाद नष्ट हो जाता है — उसकी मृत्यु हो जाती है।यहाँ मानव शरीर की नहीं, अपितु समस्त जीव-जगत की बात की जा रही है, जिसमें मानव भी शामिल है। मानव शरीर की चर्चा हम अलग से करेंगे, ताकि यह भी समझ सकें कि मानव जीवन अन्य जीवों के जीवन से थोड़ा भिन्न क्यों है।हम जीवन की बात कर रहे हैं — जीवन कभी नहीं मरता; जीवन शाश्वत सत्य है। हम यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं कि जीवन सत्य है और कभी नष्ट नहीं होता। हम सभी मानते हैं कि हमारे जन्म से पूर्व भी जीवन विद्यमान था। मनुष्य के धरती पर प्रादुर्भाव से पूर्व भी जीवन था। मनुष्य के बनने से पहले भी जीवन था। तो क्या हमारी मृत्यु के बाद भी जीवन रहेगा।शरीर की मृत्यु के बाद यदि जीवन रहेगा भी, तो क्या लाभ? शरीर ही वह माध्यम है, जिसके द्वारा हम जान पाते हैं कि जीवन क्या है और उसका महत्व क्या है। जब शरीर ही नहीं रहेगा, तो जीवन का क्या अर्थ? मृत्यु के बाद कुछ याद नहीं रहता। मृत्यु के बाद यह भी कोई अंतर नहीं पड़ता कि जीवन रहेगा या नहीं। तो फिर हम इस पर विचार क्यों करें?
“यह अंश हमारी पुस्तक सर्व साम्य अद्वैत प्रकृति चेतनवाद दर्शन — भाग 1 : नव सवित तत्व प्रकृतिवाद से लिया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता की स्थापना करके विश्व में शांति स्थापित करना है, ताकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों के जीवन में शांति बनी रहे, मनुष्य के जीवन में भी संतुलन और सौहार्द रहे, तथा सभी मनुष्य आपस में मिल-जुलकर अपने विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकें। हमारी प्रकृति से प्रार्थना है कि धरती पर स्थित प्रत्येक जीव सुखी रहे, स्वस्थ रहे।” आप भी चाहते हैं विश्व में शांति तो हमसे संपर्क करें।
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