क्या जीवन शरीर से परे है? विज्ञान और दर्शन की संयुक्त दृष्टि

 

हम यह मानकर चलें तो अधिक उपयुक्त होगा कि जब तक शरीर है, तब तक ही जीवन है। शरीर की मृत्यु के बाद जीवन का क्या महत्व रह जाता है? फिर जीवन रहे या न रहे, उससे हमें क्या अंतर पड़ने वाला है? हम इस विषय पर विस्तृत चर्चा आगे करेंगे, परंतु पहले यह समझना आवश्यक है कि क्या हमारे जन्म से पहले भी जीवन था। इसी प्रश्न में यह उत्तर छिपा हुआ है कि यदि हम नहीं भी रहेंगे तो भी जीवन बना रहेगा।विज्ञान इस तथ्य को स्वीकार करती है कि मनुष्य के प्रादुर्भाव से करोड़ों वर्ष पहले पृथ्वी पर जीवन विद्यमान था, तभी तो मनुष्य का अस्तित्व संभव हुआ। और जब संपूर्ण मानव जाति का विनाश भी हो जाएगा, तब भी जीवन किसी न किसी रूप में अवश्य रहेगा, क्योंकि जीवन एक शाश्वत सत्य है।अब प्रश्न यह उठता है कि शरीर की मृत्यु के बाद भी जीवन किस प्रकार बना रहता है, जबकि शरीर ही जीवन की पहचान देता है, नाम देता है, जीवन की परिभाषा और व्याख्या करता है। शरीर ही जीवन को जीवन से जोड़ता है और नए जीवन का सृजन करता है। एक शरीर ही दूसरे शरीर का निर्माण करता है। ऐसे में यह स्वीकार करना कठिन हो जाता है कि शरीर नष्ट तो हो जाता है, परंतु जीवन शाश्वत है। विज्ञान कहता है कि बिना शरीर के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

दूसरा प्रश्न यह है कि किसी भी जीव के जन्म से लेकर मृत्यु तक का कालखंड ही यदि जीवन नहीं है, तो फिर जीवन क्या है? तीसरा प्रश्न यह भी है कि यदि जीवन शाश्वत है, तो उसका प्रारंभ कैसे हुआ और अंत कैसे होगा? चौथा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जीवन संचालित कैसे होता है? जीवन को नियंत्रित कौन करता है? शरीर की आयु का निर्धारण कैसे होता है? क्या शरीर पर जीवन का पूर्ण नियंत्रण है, या शरीर और जीवन दोनों अलग-अलग तत्व हैं, अथवा दोनों एक ही हैं?ये सभी प्रश्न हर मनुष्य के मन में कभी न कभी अवश्य उठते हैं, विशेषकर तब जब वह दुखी होता है। सुख के समय मनुष्य को जीवन का अस्तित्व दिखाई ही नहीं देता। उस समय उसे लगता है कि सब कुछ उसी की वजह से है—वह अपने “मैं” को ही सर्वोपरि मानता है। परंतु दुख में उसका अहंकार टूट जाता है और तब वह वास्तविकता को समझने का प्रयास करता है। हकीकत को जानने के लिए, और यह समझने के लिए कि उसके “मैं” से भी अधिक शक्तिशाली कौन-सी सत्ता है जिसने उसे पराजित कर दिया—मनुष्य इन सभी प्रश्नों के उत्तर ढूंढने की कोशिश करता है।जीवन एक गतिशील ऊर्जा है, जो निरंतर गति करती रहती है और जिसे हम जीवन-शक्ति कहते हैं। जीवन-शक्ति का स्रोत भौतिक ऊर्जा है। भौतिक ऊर्जा ही वातावरण का निर्माण करती है और वही वातावरण जीवन-शक्ति को उत्पन्न करता है। यही जीवन-शक्ति सभी जीवों को शरीर प्रदान करती है और उस शरीर को गति देने के लिए भौतिक ऊर्जा का एक अंश शरीर में प्रवाहित करती है, जिससे शरीर कार्य करता है।
जब इसी भौतिक ऊर्जा का प्रभाव शीतल पड़ने लगता है, तो शरीर की कार्यशीलता धीरे-धीरे कमजोर होने लगती है। एक समय ऐसा आता है जब शरीर पूर्णतः शिथिल हो जाता है। उसके सभी अंग काम करना बंद कर देते हैं, जिसे हम मृत्यु कहते हैं।शरीर की मृत्यु के बाद भी उस शरीर में ऊर्जा का एक सूक्ष्म प्रवाह कुछ समय तक बना रहता है, परंतु वह अत्यंत धीमा होता है, जिससे अंगों को ऊर्जा प्राप्त नहीं हो पाती और वे कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं। मृत शरीर में भी ऊर्जा का क्षीण प्रभाव तब तक बना रहता है, जब तक कि वह शरीर पूर्णतः नष्ट न हो जाए। इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण यह है कि मृत्यु के पश्चात कुछ समय बाद उस शरीर में ऐसे जीव उत्पन्न हो जाते हैं जो उसे नष्ट करने लगते हैं। प्रश्न यह उठता है कि जब शरीर मृत हो चुका है, तो उसके भीतर नया जीव कैसे पनप सकता है?उत्तर यह है कि मृत्यु के बाद शरीर के अंग भले ही काम करना बंद कर दें, परंतु उसमें ऊर्जा का सूक्ष्म संचार बना रहता है। उसी ऊर्जा के कारण शरीर में सूक्ष्म जीव पनपते हैं और धीरे-धीरे उसे क्षय कर देते हैं। शरीर नष्ट होने के बाद वे जीव भी नष्ट हो जाते हैं। यही जीवन-शक्ति का स्वाभाविक क्रम है। यही प्रकृति का शाश्वत नियम है कि जो बना है, वह एक दिन अवश्य नष्ट होगा।भौतिक संसार बनता है और एक निश्चित काल के बाद उसका विनाश प्रारंभ हो जाता है। मानव-जीवन प्रकृति की अनुपम रचना है। हमारा जीवन हमारा नहीं, बल्कि प्रकृति का वरदान है, जो मनुष्य के कंधों पर एक विशाल जिम्मेदारी रखता है। प्रत्येक मनुष्य का प्रथम कर्तव्य प्रकृति के प्रति है, क्योंकि बिना प्रकृति के हमारा जीवन संभव ही नहीं।हम यहाँ यह चर्चा कर रहे थे कि हमारे मरने के बाद जीवन रहे या न रहे, उससे हमें क्या फर्क पड़ता है? सच यही है कि जब शरीर ही नहीं रहेगा तो इस प्रश्न का महत्व भी समाप्त हो जाता है। परंतु एक बात अवश्य स्मरणीय है—यदि हम अपने जीवन-काल में प्रकृति को नुकसान पहुँचाएँगे, तो उसका परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। यदि हम पर्यावरण को क्षति पहुँचाते हैं, तो अगली पीढ़ियों को उसका भयंकर दुष्परिणाम झेलना ही पड़ेगा।

“यह अंश हमारी पुस्तक सर्व साम्य अद्वैत प्रकृति चेतनवाद दर्शन — भाग 1 : नव सवित तत्व प्रकृतिवाद से लिया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता की स्थापना करके विश्व में शांति स्थापित करना है, ताकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों के जीवन में शांति बनी रहे, मनुष्य के जीवन में भी संतुलन और सौहार्द रहे, तथा सभी मनुष्य आपस में मिल-जुलकर अपने विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकें। हमारी प्रकृति से प्रार्थना है कि धरती पर स्थित प्रत्येक जीव सुखी रहे, स्वस्थ रहे।” आप भी चाहते हैं विश्व में शांति तो हमसे संपर्क करें।

जीमेल-: cosmicadvaiticconsciousism@gmail.com

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