🌿 भाग 1 — प्रकृति: जीवन का आधार और सर्वोच्च सत्ता
1. प्रस्तावना — मनुष्य और प्रकृति का अनन्त संबंध
धरती पर जितने भी जीव मौजूद हैं—मनुष्य, पशु, पक्षी, पेड़-पौधे, सूक्ष्म जीव और समुद्री जीव—सभी का अस्तित्व केवल एक शक्ति पर निर्भर है: प्रकृति।
मनुष्य चाहे जितनी भी तकनीक विकसित कर ले, चाहे जितनी भी ऊँची इमारतें बना ले, चाहे अंतरिक्ष तक पहुँच जाए, लेकिन उसकी शुरुआत और अंत—दोनों—प्रकृति से ही बंधे हुए हैं।प्रकृति मनुष्य की आवश्यकता नहीं, मनुष्य प्रकृति की उपज है।मनुष्य प्रकृति को छोड़े बिना कुछ नहीं कर सकता, पर प्रकृति मनुष्य के बिना भी उतनी ही सुंदर और संतुलित रह सकती है, जितनी वह करोड़ों वर्षों से है।यही कारण है कि प्रकृति को सर्वोच्च सत्ता, सर्वोच्च शक्ति, धर्म, ईश्वर, या परम तत्व कहा गया है।प्रकृति न केवल जीवन देती है, बल्कि जीवन को चलाने के लिए आवश्यक ऊर्जा, भोजन, जल, वायु, उष्मा, स्थिरता, संतुलन, अनुकूल वातावरण और सुरक्षा भी प्रदान करती है।
इसलिए कहा गया:“प्रकृति जीवन नहीं देती — प्रकृति ही जीवन है।”
2. प्रकृति ही जीवन का आधार क्यों?
प्रकृति का अर्थ केवल पेड़-पौधे नहीं है।प्रकृति का अर्थ है:
सूर्य
चंद्रमा
पृथ्वी
वायु
जल
मिट्टी
मौसम
पर्वत
महासागर
जंगल
नदियाँ
ऊर्जा
सूक्ष्म जीव
पर्यावरण का संपूर्ण संतुलन
इन सबके बिना जीवन की कल्पना तक असंभव है।
🌱 2.1 वायु – जीवन की पहली आवश्यकता
मनुष्य बिना भोजन के कुछ दिनों तक, बिना जल के कुछ दिन और बिना आश्रय के वर्षों तक रह सकता है, लेकिन बिना वायु के कुछ मिनट भी नहीं।
वायु का निर्माण, शुद्धिकरण और संतुलन केवल प्रकृति की प्रणाली करती है — पेड़-पौधे, समुद्र, पर्वत और वातावरण।
💧 2.2 जल – जीवन की नींव
पृथ्वी पर जीवन केवल इस कारण संभव है कि यहाँ पानी है।
पानी का संचरण—वाष्पीकरण, बादल बनना, वर्षा, नदी-धाराएँ—यह सब प्रकृति का चमत्कार है।जहाँ पानी नहीं, वहाँ जीवन नहीं।
🌞 2.3 सूर्य – ऊर्जा का प्रथम स्रोत
सूर्य न हो तो:
पृथ्वी अंधकार में डूब जाए
तापमान शून्य से नीचे चला जाए
पौधे भोजन न बना सकें
कोई जीवित न बच सके
सूर्य की ऊर्जा ही जीवन की ऊर्जा है।
🌍 2.4 पृथ्वी – जीवन को धारण करने वाली माता
पृथ्वी की मिट्टी में ही भोजन जन्म लेता है।मिट्टी की उर्वरता, खनिज, पोषक तत्व—सब प्रकृति का उपहार है।भोजन प्रकृति बनाती है, मनुष्य केवल उसे खाता है।
3. मनुष्य का अस्तित्व: प्रकृति की दया पर
मनुष्य स्वयं को आधुनिकता का राजा समझ बैठा है, लेकिन भूल जाता है कि:
नदियाँ सूख जाएँ तो शहर मर जाते हैं
वायु प्रदूषित हो जाए तो शरीर बीमार हो जाता है
जंगल न रहें तो वर्षा नहीं होती
मिट्टी मर जाए तो खाद्यान्न समाप्त हो जाता है
सूर्य के ताप में वृद्धि से पृथ्वी असहनीय हो जाती है
सच्चाई यह है कि मनुष्य आज शक्तिशाली नहीं, बल्कि सबसे कमजोर है।
क्योंकि हर जीव अपने वातावरण के साथ तालमेल बिठाता है, लेकिन मनुष्य वातावरण को अपने अनुसार बदलना चाहता है — और यही उसका सबसे बड़ा अपराध है।
4. प्रकृति को नुकसान — और उसके भयानक परिणाम
आज मनुष्य प्रकृति के साथ जो कर रहा है, वह केवल पर्यावरण का विनाश नहीं, बल्कि अपने भविष्य का विनाश है।
🚨 4.1 जंगलों का विनाश
प्रति वर्ष लाखों हेक्टेयर जंगल काटे जा रहे हैं।जंगल कटेंगे → वायु प्रदूषण बढ़ेगा → वर्षा कम होगी → तापमान बढ़ेगा → प्राणियों का आवास समाप्त होगा → खाद्य श्रृंखला टूटेगी।
🚨 4.2 जल प्रदूषण
नदियाँ अब जीवन नहीं देतीं, बीमारियाँ देती हैं।
कारण:
रसायन
फैक्ट्रियों का अपशिष्ट
प्लास्टिक
मलजल
दुनिया के कई हिस्सों में पीने का पानी खत्म हो चुका है।यह 21वीं सदी का सबसे बड़ा संकट है।
🚨 4.3 वायु प्रदूषण
वायु में अब ऑक्सीजन से ज्यादा धुआँ और विषैले कण हैं।हवा जो जीवन थी, अब मृत्यु बन गई है।
🚨 4.4 ग्लोबल वार्मिंग — पृथ्वी का ताप बढ़ रहा है
मानव इतिहास में पहली बार पृथ्वी का ताप इतनी तेजी से बढ़ रहा है।
इसके परिणाम:
अत्यधिक गर्मी
समुद्र स्तर वृद्धि
ग्लेशियर पिघलना
चक्रवात
सूखा
बाढ़
मौसम का असंतुलन
🚨 4.5 अन्य जीवों का विलुप्त होना
मानव लालच के कारण प्रतिदिन कई प्रजातियाँ नष्ट हो रही हैं।धरती की जैव विविधता कम हो रही है।जैव विविधता कम होना = मानव जीवन का खतरा।
5. प्रकृति का संतुलन — और उसका टूटना
प्रकृति एक विशाल, अनंत और संवेदनशील प्रणाली है।इस प्रणाली में हर तिनके, हर कण, हर जीव, हर पौधे, हर नदी का कार्य निश्चित है।जब मनुष्य इस संतुलन को तोड़ता है, प्रकृति प्रतिक्रिया देती है — और उसकी प्रतिक्रिया विनाशकारी होती है।संतुलन बिगड़ने के प्रमुख कारण:
अति उपयोग
अति उपभोग
अति उत्पादन
लालच
जनसंख्या विस्फोट
प्रदूषण
कटान
उद्योगिकरण
अर्थात जो कुछ प्रकृति देती है, मनुष्य उससे अधिक मांगता है।
6. मनुष्य का भविष्य प्रकृति के हाथों में
यदि आज प्रकृति को नहीं बचाया गया तो:
हवा से जीवन छिन जाएगा
पानी खत्म हो जाएगा
खेती नष्ट हो जाएगी
भोजन महँगा और दुर्लभ हो जाएगा
Krankheiten (बीमारियाँ) बढ़ेंगी
प्राकृतिक आपदाएँ सामान्य बन जाएँगी
मानव सभ्यता खतरे में आ जाएगी
जो प्रकृति को चुनौती देता है, वह स्वयं अपने अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा देता है।
7. समाधान — प्रकृति को बचाने का मार्ग
🌳 7.1 वृक्षारोपण
प्रत्येक मनुष्य प्रति वर्ष कम से कम 10 पेड़ लगाए।
💧 7.2 जल संरक्षण
जल जीवन है — इसे बचाना आवश्यक है।
♻ 7.3 प्लास्टिक का उपयोग कम करें
🌞 7.4 सौर ऊर्जा को अपनाएँ
🚯 7.5 कचरा पृथ्वी पर न फेंकें
🌿 7.6 प्रकृति को धर्म मानकर उसका पालन करें
जब मनुष्य प्रकृति को ईश्वर, धर्म, ध्यान, आस्था, और समर्पण का रूप मान लेगा, तभी प्रकृति बचेगी।
8. निष्कर्ष — प्रकृति को मानो, प्रकृति को बचाओ
प्रकृति केवल संसाधन नहीं —प्रकृति हमारा जीवन है।
मनुष्य को यह समझना होगा कि वह प्रकृति को नहीं चला रहा, बल्कि प्रकृति उसे चला रही है।अगर हम प्रकृति का स
म्मान करेंगे, तो प्रकृति हमें जीवन देगी।
अगर हम प्रकृति का विनाश करेंगे, तो प्रकृति हमें समाप्त कर देगी।
“यह अंश हमारी पुस्तक सर्व साम्य अद्वैत प्रकृति चेतनवाद दर्शन — भाग 1 : नव सवित तत्व प्रकृतिवाद से लिया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता की स्थापना करके विश्व में शांति स्थापित करना है, ताकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों के जीवन में शांति बनी रहे, मनुष्य के जीवन में भी संतुलन और सौहार्द रहे, तथा सभी मनुष्य आपस में मिल-जुलकर अपने विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकें। हमारी प्रकृति से प्रार्थना है कि धरती पर स्थित प्रत्येक जीव सुखी रहे, स्वस्थ रहे।” आप भी चाहते हैं विश्व में शांति तो हमसे संपर्क करें।
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