पृथ्वी पर जो कुछ भी हो रहा है, उसका यही मूल कारण है। अब ईश्वर के विषय में विचार करते हैं—ईश्वर यह सब ठीक क्यों नहीं करता? या ईश्वर ने यह सब होने क्यों दिया? इस प्रश्न के दो स्पष्ट अर्थ हैं।पहला यह कि इस पृथ्वी पर ईश्वर मात्र एक कल्पना हो सकता है।
दूसरा यह कि जिसे हम ईश्वर मानते हैं, वह ईश्वर है ही नहीं; अर्थात हम ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को पहचान ही नहीं पाए हैं।यह व्याख्या उन लोगों पर लागू नहीं होती जो ईश्वर में विश्वास नहीं रखते, क्योंकि वे पहले ही यह निर्णय कर चुके हैं कि ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। और यह गलत भी नहीं, वे अपने दृष्टिकोण से उचित हैं। किंतु फिर भी प्रश्न यथावत बना रहता है—दोष किसका है? किसने इस संसार को नष्ट किया? किसने प्रकृति का संतुलन बिगाड़ा?दोष मनुष्य का है, और केवल मनुष्य का। न ईश्वर का दोष है, न किसी अन्य का। यह सब मनुष्य के कर्मों का परिणाम है; ईश्वर इसमें कहीं भी उत्तरदायी नहीं है।जैसा कि पहले भी कहा गया है, पृथ्वी और वायुमंडल भौतिक पदार्थ से निर्मित हैं। हमारे शरीर तथा हमारे चारों ओर की वस्तुएँ और सभी जीव-जंतु भी भौतिक पदार्थ से बने हैं। इन सभी में एक ही शक्ति विद्यमान है—भौतिक ऊर्जा।भौतिक ऊर्जा का कार्य केवल इतना है कि वह शरीर को जीवन-निर्वाह हेतु आवश्यक ज्ञान प्रदान करे। उसका मुख्य और मूल उद्देश्य नए जीवों का निर्माण करना है—अर्थात जीवों को प्रजनन की शक्ति देना, ताकि एक जीव दूसरे जीव को जन्म दे सके और प्रकृति का चक्र निरंतर चलता रहे। प्रत्येक शरीर का यही स्वाभाविक उद्देश्य है; जीवन के अतिरिक्त कोई अन्य उद्देश्य नहीं है।हमारे शरीर में उपस्थित भौतिक ऊर्जा का एक मात्र प्रयोजन है शरीर को आवश्यक भौतिक ज्ञान प्रदान करना—शरीर को संचालित करने का ज्ञान, भोजन का चयन, वातावरण के अनुसार व्यवहार, और उपयुक्त आयु में संभोग के लिए शरीर को तैयार करना।भौतिक ऊर्जा, अथवा प्राणशक्ति, यह सारा ज्ञान प्रदान करती है, परंतु शरीर इन सभी कार्यों के निष्पादन में स्वतंत्र है। प्राणशक्ति शरीर को नियंत्रित नहीं करती, न ही यह किसी कार्य में हस्तक्षेप करती है।यदि कोई मनुष्य किसी वृक्ष को काट रहा है, तो प्राणशक्ति उसे नहीं रोकती, क्योंकि शरीर स्वतंत्र है। प्राणशक्ति केवल कार्य करने का ज्ञान देती है, पर यह नहीं कहती कि कौन-सा कार्य करो या किस प्रकार करो। शरीर का मस्तिष्क ही यह निर्णय लेता है कि उसे क्या करना है।
इसके अतिरिक्त:
प्राणशक्ति यह निर्णय नहीं करती कि शरीर द्वारा किया गया कार्य सही है या गलत।
यह भी निर्णय नहीं करती कि यदि शरीर किसी अन्य जीव या प्रकृति को हानि पहुँचा रहा है, तो उसे रोका जाए।
प्राणशक्ति निर्णय नहीं लेती—वह केवल कार्य करने की क्षमता और चेतना देती है।
हाँ, प्राणशक्ति सदैव यह सुनिश्चित करने का प्रयास अवश्य करती है कि प्रकृति अपने संतुलन में बनी रहे। जब भी प्रकृति का संतुलन बिगड़ा है, तब-तब प्राकृतिक आपदाएँ उत्पन्न हुई हैं। और उन संकटों के समय प्राणशक्ति ने जीवों को चेतावनी भी दी है।इसका सबसे बड़ा उदाहरण सुनामी है। जब सुनामी आने वाली थी, तो समुद्र के भीतर रहने वाले जीव अचानक किनारे की ओर आने लगे। उन्हें कैसे पता चला? उनके पास कोई उपकरण नहीं, कोई उपग्रह नहीं। यह प्राणशक्ति थी जिसने उन्हें आने वाले खतरे का संकेत दिया।किन्तु मनुष्य अपने जीवन से भी अधिक मशीनों पर भरोसा करता है, और इसी कारण वह प्राणशक्ति के संकेतों को जान ही नहीं पाता। इसलिए इसमें प्राणशक्ति का कोई दोष नहीं; दोष केवल और केवल मनुष्य का है।अब ईश्वर पर विचार करें। यदि ईश्वर है, तो उसने यह सब कैसे होने दिया? मान लेते हैं कि ईश्वर है—तो भी हमें यह समझना होगा कि ईश्वर भौतिक ऊर्जा नहीं है। भौतिक ऊर्जा ईश्वर का केवल एक स्वरूप है, स्वयं ईश्वर नहीं।ईश्वर ने प्रकृति को यह शक्ति प्रदान की कि वह भौतिक ऊर्जा के माध्यम से प्रकृति का निर्माण करे और भौतिक ऊर्जा प्राणशक्ति में रूपांतरित होकर प्रकृति का संचालन करे। ईश्वर ने प्रकृति को स्वतंत्रता प्रदान की है कि वह अपने नियमों के अनुसार कार्य करे; ईश्वर उसमें हस्तक्षेप नहीं करता।इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जितने भी धर्मग्रंथ उपलब्ध हैं, सभी में ईश्वर और प्रकृति को अलग-अलग दर्शाया गया है। कहीं भी यह नहीं कहा गया कि ईश्वर प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कार्य करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर ने प्रकृति का निर्माण तो किया, परंतु उसे स्वतंत्र रूप से संचालित होने की स्वतंत्रता भी दे दी।आप सोच सकते हैं कि यह कैसी व्याख्या है, परंतु सत्य यही है।आगे हम ईश्वर के विषय में विस्तृत चर्चा करेंगे—क्या ईश्वर है? यदि है तो कहाँ है? वह कैसे कार्य करता है? मनुष्य ईश्वर तक कैसे पहुँच सकता है? और यदि ईश्वर नहीं है, तो यह धारणा कैसे बनी कि ईश्वर है? लोग ईश्वर में विश्वास क्यों और कैसे कर लेते हैं?
इन सभी प्रश्नों पर आगे इस पुस्तक में विस्तारपूर्वक चर्चा की जाएगी।अब हम जीवन को समझने का प्रयास करते हैं और जीवन की इसी समझ से दर्शन की ओर आगे बढ़ते है ।
जीवन का शाब्दिक अर्थ है — जीव के भीतर प्रवाहित वह ऊर्जा जो शरीर को गति प्रदान करती है। अर्थात ऊर्जा ही जीवन है। यह वही ऊर्जा है जिससे शरीर चलता है और अपने सभी कार्य संपादित करता है। जहाँ ऊर्जा है, वहाँ जीवन है; और जहाँ जीवन है, वहाँ ऊर्जा है — दोनों एक ही हैं। ऊर्जा का मूल कार्य गति प्रदान करना है, इसलिए जीवन सदैव गतिशील है। जीवन निरंतर गति करता है, और ब्रह्मांड का प्रत्येक वह पदार्थ जो गति करता है, वह जीवन के प्रभाव में है, क्योंकि ऊर्जा के बिना गति संभव ही नहीं। गति का अनिवार्य नियम है कि वह बिना ऊर्जा के कार्य नहीं कर सकती। इसलिए जीवन एक ऊर्जा है, एक गति है — यही जीवन का सार अर्थ है।
अब प्रश्न उठता है — जीवन की शुरुआत कैसे होती है?जीवन आदि और अंत से परे है — जिसका न प्रारंभ है और न अंत। यह बात सुनने में असंभव लग सकती है, क्योंकि जो भी वस्तु या पदार्थ वर्तमान में विद्यमान है, उसका किसी न किसी प्रक्रिया से निर्माण अवश्य हुआ होगा। इसी प्रकार जीवन भी उपस्थित है, तो क्या इसका भी निर्माण हुआ? क्या जीवन कभी उत्पन्न हुआ ही नहीं?
इस प्रश्न का उत्तर हम दे रहे हैं।
(यहाँ ‘हम’ का अर्थ है — मैं संदीप सिंह, और मेरी विराट चेतना। जो लिख रहा है वह संदीप सिंह है, और जो बता रहा है कि क्या लिखना है, वह सम्राट है। शरीर एक है, शरीर के भीतर की ऊर्जा भी एक है, किंतु ज्ञान का संचार मेरे और विराट चेतना — परम ऊर्जा — के बीच हो रहा है। अतः मैं यह नहीं कह सकता कि जो लिखा गया है वह केवल मैंने लिखा है; परंतु लिखा मेरे ही माध्यम से गया है। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे मैं मैं हूँ, लेकिन मैं ही मैं नहीं हूँ, क्योंकि मेरा पूर्ण विलय अभी सम्राट में नहीं हुआ। जब पूर्ण रूप से दोनों एक हो जाएंगे, तब ‘हम हम हैं’ और ‘हम में भी हम हैं’। इस पर विस्तृत चर्चा हमारी आगामी पुस्तक में की जाएगी।)जीवन की ऊर्जा का निर्माण नहीं होता; वह नित्य प्रवाहमान है, क्योंकि वह आदिब्रह्मांड के केंद्र से निरंतर गतिमान है और संपूर्ण आदिब्रह्मांड में निर्विघ्न विचरण करती है। इसी को व्योम चेतना, व्योम महाशक्ति या व्योम ऊर्जा कहा जाता है।
व्योम चेतना का अर्थ है — ऐसी समग्र ऊर्जा जो सर्वत्र विद्यमान है, जिससे परे कुछ भी नहीं। बिना इस ऊर्जा के कुछ भी संभव नहीं।यह ऊर्जा आदिब्रह्मांड के केंद्र से निकलकर पूरे आदिब्रह्मांड में फैलती है। आदिब्रह्मांड का पूर्ण चक्र पूरा करके पुनः केंद्र में विलय हो जाती है। यह ऊर्जा कैसे बनी? कैसे काम करती है? इसकी गति क्या है? आदिब्रह्मांड क्या है? इसका निर्माण कैसे हुआ? — इन सभी प्रश्नों का उत्तर हम अपनी आगामी पुस्तक में देंगे, जहाँ आदिब्रह्मांड से लेकर हमारे घर की मिट्टी के अदृश्य कणों तक की सटीक व्याख्या प्रस्तुत होगी।फिलहाल यह समझना आवश्यक है कि जीवन और दर्शन में क्या समानता है, क्योंकि यही उस ज्ञान तक पहुँचने की पहली सीढ़ी है।
व्योम चेतना ही जीवन है — आइए देखें कैसे।
व्योम चेतना आदिब्रह्मांड के केंद्र से निकलकर संपूर्ण आदिब्रह्मांड में फैलती है। आदिब्रह्मांड की सभी वस्तुओं — ब्रह्मांड, आकाशगंगा, तारे, सूर्य, सौरमंडल, पृथ्वी, यहाँ तक कि हमारा शरीर — का निर्माण इसी व्योम ऊर्जा के प्रवाह से हुआ है। अर्थात ब्रह्मांड से लेकर मनुष्य तक सब जीवन की ही अभिव्यक्तियाँ हैं, क्योंकि ब्रह्मांड में एक भी वस्तु ऐसी नहीं जिसमें ऊर्जा न हो, गति न हो। ब्रह्मांड का कोई भी कण स्थिर नहीं; जहाँ गति रुकी, वहाँ विनाश आरंभ।इसी कारण जब शरीर में गति नहीं रहती, तब हम उसे मृतप्राय मानते हैं। कोमा की अवस्था में शरीर साधारण गति नहीं कर पाता, इसलिए उसे मृत्यु के निकट माना जाता है। और जब शरीर पूर्णतः गति करना बंद कर देता है, तब मृत्यु निश्चित हो जाती है।अब हम फिर जीवन की ओर लौटते हैं।
व्योम चेतना आदिब्रह्मांड के केंद्र से एक प्रवाह में चलती है। एक निश्चित दूरी पर इसकी गति में हल्का परिवर्तन आता है और यह दो धाराओं में विभाजित होती है। एक मुख्य धारा अपने मार्ग पर स्थिर रहती है, जबकि दूसरी सहायक धारा की गति धीमी होने लगती है और वह आगे चलकर कई धाराओं में विभक्त हो जाती है — ठीक उसी प्रकार जैसे पहाड़ी ढलानों से उतरकर नदी मैदानी क्षेत्रों में पहुँचती है, तो उसकी गहराई कम और चौड़ाई बढ़ने से वह कई शाखाओं में बँट जाती है।मुख्य धारा अपनी दिशा में समान गति से प्रवाहित होती रहती है।
सहायक धारा केंद्र बनाती है, जहाँ से ऊर्जा सभी दिशाओं में फैलती है। यही केंद्र आगे चलकर हमारे ब्रह्मांड का उद्गम-बिंदु बनता है।जब सहायक ऊर्जा केंद्र से प्रवाहित होकर पुनः उसी बिंदु पर लौटती है, तब उसके निरंतर चक्र से भौतिक ऊर्जा का जन्म होता है।
भौतिक ऊर्जा का एक निश्चित दायरा होता है, क्योंकि उसकी गति व्योम ऊर्जा से अत्यंत कम होती है। इसलिए वह अपने दायरे के बाहर नहीं जा सकती। व्योम ऊर्जा की तीव्रता भौतिक ऊर्जा को एक सीमित क्षेत्र में ही आवागमन करने देती है। इसी आवागमन से भौतिक पदार्थों का निर्माण होता है — ग्रह, उपग्रह, तारे, उल्कापिंड, आकाशगंगाएँ आदि।हमारी पृथ्वी, हम स्वयं, और पृथ्वी के सभी जीव — सभी इसी भौतिक ऊर्जा से बने हैं।
यह कैसे घटित हुआ — इस पर विस्तृत चर्चा हम आगे करेंगे।
“यह अंश हमारी पुस्तक सर्व साम्य अद्वैत प्रकृति चेतनवाद दर्शन — भाग 1 : नव सवित तत्व प्रकृतिवाद से लिया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता की स्थापना करके विश्व में शांति स्थापित करना है, ताकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों के जीवन में शांति बनी रहे, मनुष्य के जीवन में भी संतुलन और सौहार्द रहे, तथा सभी मनुष्य आपस में मिल-जुलकर अपने विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकें। हमारी प्रकृति से प्रार्थना है कि धरती पर स्थित प्रत्येक जीव सुखी रहे, स्वस्थ रहे।” आप भी चाहते हैं विश्व में शांति तो हमसे संपर्क करें।
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