हमें अपनी गलती दिखाई नहीं देती और हम दोष देते हैं ईश्वर को—कि ईश्वर क्या कर रहा है, उसे दिखाई नहीं देता कि पृथ्वी पर क्या चल रहा है? हमें ईश्वर को दोष नहीं देना चाहिए; हमें अपनी गलती स्वीकार करनी चाहिए कि गलती हमने की है। हमने पर्यावरण का ध्यान नहीं रखा, हमने पर्यावरण को तबाह कर दिया। यह गलती मनुष्य की है, ईश्वर की नहीं।आप ईश्वर में विश्वास रखते हैं—यह अच्छी बात है, रखिए। ईश्वर पर भरोसा करना आपकी आस्था है, लेकिन आपको यह समझना होगा कि अगर गलती मनुष्य ने की है, तो उसका पछतावा भी मनुष्य को ही करना होगा। यदि मनुष्य ने प्रकृति का विनाश किया है, तो प्रकृति को ठीक भी मनुष्य ही कर सकता है। ईश्वर इसमें कुछ नहीं कर सकता। वह उन प्रजातियों को वापस धरती पर नहीं ला सकता, जो विलुप्त हो चुकी हैं। यह सब कुछ मनुष्य की वजह से हुआ है, और मनुष्य ही इसे ठीक कर सकता है।अब हमें यह जानना है कि जिस ईश्वर पर हम भरोसा करते हैं, या जो ईश्वर का स्वरूप हमें बताया गया है—चाहे वह पौराणिक ग्रंथों से हो, धर्म की व्याख्या करने वालों से हो, या किसी मान्यता से—वह सब वास्तविक नहीं है। वह ईश्वर का सच्चा स्वरूप नहीं है। वरना आप ही सोचिए—यदि ईश्वर जैसा स्वरूप हमें बताया गया है कि ईश्वर सबकी मदद करता है, न्याय करता है, सबके भीतर मौजूद है—तो क्या वह ईश्वर इतने अन्याय को सहन करेगा? क्या वह जीवों के साथ इतना अत्याचार होने देगा? नहीं—यह सत्य नहीं हो सकता।
विश्वास करना अच्छी बात है, लेकिन अंधविश्वास करना मूर्खता है। जिस ईश्वर पर आप भरोसा कर रहे हैं, आप वास्तव में उसी पर भरोसा नहीं—अंधविश्वास कर रहे हैं। एक बार प्रयास कीजिए यह समझने का कि जिस ईश्वर पर आप विश्वास रखते हैं, यदि वह सचमुच मौजूद है, तो फिर धरती पर यह सब क्यों हो रहा है?जाइए और पूछिए उन लोगों से—जो ईश्वर की महिमा गाते हैं, जो धर्म की दुकान खोलकर बैठे हैं—पैसा, पद और इज्जत कमाने के लिए। उनसे पूछिए कि उनके अनुसार ईश्वर क्या है, वह कहाँ है, और अगर ईश्वर है, तो यह सब कैसे और क्यों होने दे रहा है?हमें तो नहीं लगता कि ईश्वर है। हमें नहीं लगता कि ईश्वर यह सब देखकर चुप बैठा है। हमें नहीं लगता कि ईश्वर यही सब देख रहा है।जाकर पूछिए उनसे—जो ईश्वर के नाम पर अपना घर चला रहे हैं, अंधविश्वास फैला रहे हैं, धर्म की बात कर रहे हैं—पूछिए कि जो कुछ पृथ्वी पर हो रहा है, वह धर्म है या अधर्म?हमें पता है कि कोई भी व्यक्ति, जो धर्म में आस्था रखता है, इसका उत्तर नहीं दे पाएगा—क्योंकि हमने पहले ही कहा था कि आस्था मौन होती है।हमारा उद्देश्य किसी की आस्था पर चोट पहुँचाना नहीं है। हमारा उद्देश्य है—चिंतन, मनन और विचार को बढ़ाना। आपको समझाना कि धरती पर क्या हो रहा है, मनुष्य किस दिशा में जा रहा है, और आज के समय में धर्म की जो व्याख्याएँ मौजूद हैं—क्या वे सच साबित हो रही हैं?हम चाहते हैं कि आप पिछले हजार वर्षों में धरती पर क्या हुआ—और आपके जीवनकाल में क्या हो रहा है—उन सब पर दृष्टि डालें। आज इंटरनेट, AI और वैज्ञानिक शोध पूरी दुनिया के सामने हैं। इन सभी तथ्यों को सामने रखकर सोचिए, फिर निष्कर्ष कीजिए कि हमारी बात कितनी सत्य है।हमारा कार्य सत्य को पहचानना है—और दुनिया को सत्य की पहचान करवाना है। हमारा कार्य प्रकृति को ठीक करना है। हमारा कार्य उन प्रजातियों को संरक्षण देना है जो विलुप्त होने के कगार पर हैं। हमारा कार्य जीवन को ठीक करना है, पृथ्वी पर संतुलन बनाए रखना है। और इसके लिए हम अपनी अंतिम साँस तक प्रयास करते रहेंगे।हमारा मकसद धरती पर जीवन को सुरक्षित रखना है—चाहे वह मनुष्य का जीवन हो, पेड़-पौधों का हो, पशु-पक्षियों का हो, या कीड़े-मकोड़ों का—हर जीव का जीवन सुरक्षित रखना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है।अब आते हैं सबसे मूल बात पर—कि जो कुछ भी हो रहा है, वह क्यों हो रहा है?
इसलिए हो रहा है—क्योंकि मनुष्य स्वार्थी हो गया है। मनुष्य बँट चुका है। वह अब वह मनुष्य नहीं रहा, जिसके कंधों पर प्रकृति ने पूरी पृथ्वी की संरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी थी।मनुष्य अब केवल अपना स्वार्थ, अपना लाभ, अपनी सुविधा देखता है—और इसी स्वार्थ ने उसे उसकी जिम्मेदारी से दूर कर दिया है। हमारा कार्य है—मनुष्य को उसकी उसी मूल जिम्मेदारी की याद दिलाना। यह समझाना कि हम मनुष्य हैं—और हमारी क्या जिम्मेदारी है। हम कैसे उसे पहचान सकते हैं और ईमानदारी से निभा सकते हैं।
यही हमारा मकसद है।
“यह अंश हमारी पुस्तक सर्व साम्य अद्वैत प्रकृति चेतनवाद दर्शन — भाग 1 : नव सवित तत्व प्रकृतिवाद से लिया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता की स्थापना करके विश्व में शांति स्थापित करना है, ताकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों के जीवन में शांति बनी रहे, मनुष्य के जीवन में भी संतुलन और सौहार्द रहे, तथा सभी मनुष्य आपस में मिल-जुलकर अपने विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकें। हमारी प्रकृति से प्रार्थना है कि धरती पर स्थित प्रत्येक जीव सुखी रहे, स्वस्थ रहे।” आप भी चाहते हैं विश्व में शांति तो हमसे संपर्क करें।
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