हमारे मरने के बाद भी आने वाली पीढ़ियाँ हमें बद्दुआ देंगी। हम मरकर भी उस पाप से मुक्त नहीं हो पाएँगे, जो हमने अपने जीवन के दौरान प्रकृति को नष्ट करके किया है। यह पाप हमें मृत्यु के बाद भी जीवित रखेगा। आपके लिए भले ही जीवन समाप्त हो जाए, लेकिन अगली पीढ़ियाँ आपको चैन से मरने नहीं देंगी, क्योंकि पर्यावरण हम सभी की मूलभूत आवश्यकता है। मनुष्य कुछ समय तक बिना भोजन के रह सकता है, लेकिन बिना प्रकृति के एक क्षण भी जीवित रहना संभव नहीं है।हम क्यों नहीं समझ पाए कि जिस तत्व पर हमारा संपूर्ण जीवन आधारित है, उसी को हम नष्ट कर रहे हैं? आप यदि यह सोच रहे हैं कि “मैं मर जाऊँगा, उसके बाद प्रकृति से मेरा क्या संबंध?”, तो आप बिल्कुल गलत सोच रहे हैं। आपके मरने के बाद भी आपके शरीर से निकलने वाली नकारात्मक ऊर्जा प्रकृति की भौतिक ऊर्जा को प्रदूषित करती है, जिससे प्रकृति की शक्ति कमजोर होने लगती है और उसका संतुलन बिगड़ जाता है।जब आप प्रकृति को नुकसान पहुँचाते हैं, तब आप जीवित रहते हुए भी प्रकृति को नुकसान पहुँचा रहे होते हैं, और मरने के बाद भी। इसलिए यह कभी मत सोचिए कि “मेरे मरने के बाद जीवन रहेगा या नहीं।” धरती पर मनुष्य ही एकमात्र ऐसा जीव है जो प्रकृति की भौतिक ऊर्जा में सर्वाधिक नकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित करता है, जिससे प्रकृति का संतुलन असंतुलित होने लगता है। इसका सबसे बड़ा खामियाज़ा अन्य जीवों को उठाना पड़ता है।
गलती मनुष्य करता है, और उसकी सजा बाकी जीव-जगत को भुगतनी पड़ती है।यह नहीं कि मनुष्य अपनी गलती की सजा नहीं पाता। मनुष्य भी उसे पाता है, लेकिन प्रकृति के अन्य जीव उससे कहीं अधिक प्रभावित होते हैं, क्योंकि मनुष्य विकट से विकट परिस्थिति में भी स्वयं को किसी न किसी प्रकार ढाल लेता है, जबकि अन्य जीव ऐसा नहीं कर पाते। इसी कारण न जाने अब तक कितनी प्रजातियाँ विलुप्त हो चुकी हैं, जिनकी जानकारी तक मनुष्य को नहीं। इसका जिम्मेदार भी मनुष्य ही है। गलती मनुष्य करता है और खामियाज़ा पूरा जीव-जगत उठाता है।आप सोच रहे होंगे कि यह कैसे संभव है कि मनुष्य गलती करे और दंड पूरे जीव-जगत को मिले—लेकिन यही तो हो रहा है! मनुष्य अपने स्वार्थ और लोभ के कारण वातावरण को दूषित कर रहा है। ग्लोबल वार्मिंग बढ़ रही है, पर्यावरण प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, प्रकृति का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। इसकी वजह से न जाने कितने जीवों ने अपनी जान गंवा दी, कितनी प्रजातियाँ समाप्त हो गईं, लेकिन मनुष्य फिर भी अपने स्वार्थ से बाहर नहीं आ रहा।
आपके मन में यहाँ दो प्रश्न अवश्य उठेंगे।
पहला—यदि मनुष्य के कारण पृथ्वी नष्ट हो रही है, तो ईश्वर क्या कर रहा है?
दूसरा—ईश्वर मनुष्य की गलती की सजा अन्य जीवों को क्यों दे रहा है?
क्योंकि हमारे धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस संसार की रचना ईश्वर ने की है। जीवन ईश्वर ने दिया है, वही जीवन को चलाता है और वही जीवन को समाप्त करता है। तो फिर ईश्वर मनुष्य की गलती की सजा निर्दोष जीवों को कैसे दे सकता है? क्या ईश्वर को यह दिखाई नहीं देता कि मनुष्य क्या कर रहा है? क्या ईश्वर चुपचाप सब कुछ देख और सहन कर रहा है?
यदि धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जो गलती करे, दंड उसी को मिले, तो फिर हकीकत इसके विपरीत क्यों है—गलती मनुष्य करता है और दंड पूरा जीव-जगत भुगत रहा है?ऐसा क्यों हो रहा है?पूछिए अपने धार्मिक ग्रंथों से, पूछिए अपने ईश्वर से, पूछिए उन धर्म-गुरुओं से जो बड़े-बड़े प्रवचन देते हैं—कि मनुष्य की गलती की सजा जीव-जगत को क्यों मिल रही है। हम आपसे झूठ नहीं कह रहे; यह हकीकत है।
अपने चारों तरफ देखिए। अपने घर या मोहल्ले के किसी बुजुर्ग से पूछिए कि पहले का वातावरण कैसा था—पहले कितने जीव, कितने पक्षी, कितने पशु हमारे आसपास होते थे। और आज का वातावरण कैसा है? आज जीव-जन्तु कम क्यों हो गए? पक्षी कम क्यों हो गए? पेड़-पौधे कम क्यों हो गए?खोजिए इन सबका कारण, और अंत में एक ही वजह सामने आएगी—मनुष्य का स्वार्थ। यही स्वार्थ प्रकृति को नष्ट कर रहा है।और जिस ईश्वर पर लोग विश्वास करते हैं—वह कुछ भी नहीं कर रहा।
हम आपकी आस्था को कमज़ोर नहीं कर रहे।
हम केवल इतना कह रहे हैं कि उन लोगों से जाकर पूछिए जो धर्म के नाम पर बड़े-बड़े दावे करते हैं—कि आज पृथ्वी की यह हालत क्यों है? कहाँ है वह ईश्वर जिस पर पूरी दुनिया भरोसा करती है? क्या ईश्वर इतना निर्दयी है कि मनुष्य की गलती की सजा वह अन्य जीवों को दे? क्या ईश्वर इतना कमजोर है कि वह प्रकृति को ठीक नहीं कर सकता? क्या ईश्वर अंधा है कि उसे पृथ्वी पर हो रहा विनाश दिखाई नहीं देता? क्या ईश्वर के कान बंद हैं कि उसे जीवों की पीड़ा सुनाई नहीं देती? क्या उसके हाथ इतने कमजोर हैं कि वह जीवों की रक्षा नहीं कर सकता?जाकर पूछिए उन लोगों से जो धर्म के नाम पर अज्ञान बाँट रहे हैं।
जाकर पूछिए उन लोगों से जो ईश्वर के अस्तित्व का दावा करते हैं।
जाकर पूछिए उन धार्मिक विद्वानों से, पादरियों से, इमामों से—कि पृथ्वी पर यह अन्याय क्यों हो रहा है? गलती मनुष्य की और सजा पूरे जीव-जगत की—क्या यह ईश्वर का कानून है? क्या यह न्याय है?अपने आप से पूछिए—क्या जो कुछ हो रहा है, वह सही है?किसी के पास इसका उत्तर नहीं है। सभी मौन हैं। सब जानते हैं कि गलत हो रहा है, फिर भी मौन हैं। कैसी विडंबना है यह—जहाँ सब कुछ आँखों के सामने हो रहा है और मनुष्य अपने लालच और स्वार्थ के कारण कुछ नहीं कर पा रहा।कितनी बेबसी है यह—जहाँ अपने ही, अपने को मार रहे हैं।
क्या यह धरती हमारी नहीं?
क्या यह प्रकृति हमारी नहीं?
क्या इस धरती के सभी जीव हमारे नहीं?क्या हम बिना प्रकृति के जीवित रह सकते हैं?क्या हम बिना हवा, पानी और भोजन के जीवित रह सकते हैं?
नहीं—इनमें से एक भी न मिले तो हम एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकते।हवा, पानी, धरती, भोजन—ये सब हमारे शरीर की मूलभूत आवश्यकताएँ हैं। इनके बिना मानव शरीर का अस्तित्व संभव नहीं।
जब हम यह जानते हैं कि इनके बिना हम जीवित नहीं रह सकते, तो फिर हम इन सबका मूल आधार—प्रकृति—को ही क्यों नष्ट कर रहे हैं?अब आप ही बताइए—मनुष्य पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान प्राणी है या सबसे मूर्ख? जो चीज हमारे जीवन, हमारे बच्चों के जीवन, और आने वाली पीढ़ियों के जीवन का आधार है—उसको नष्ट कर रहे हैं। क्या यह बुद्धिमानी है?प्रकृति हमारा पहला धर्म है।वह हमें सिखाती है कि सभी जीवों का जीवन समान है। किसी में
कोई भेद नहीं।
“यह अंश हमारी पुस्तक सर्व साम्य अद्वैत प्रकृति चेतनवाद दर्शन — भाग 1 : नव सवित तत्व प्रकृतिवाद से लिया गया है। इस पुस्तक का उद्देश्य प्रकृति की सर्वोच्च सत्ता की स्थापना करके विश्व में शांति स्थापित करना है, ताकि धरती पर रहने वाले सभी जीवों के जीवन में शांति बनी रहे, मनुष्य के जीवन में भी संतुलन और सौहार्द रहे, तथा सभी मनुष्य आपस में मिल-जुलकर अपने विकास का मार्ग प्रशस्त कर सकें। हमारी प्रकृति से प्रार्थना है कि धरती पर स्थित प्रत्येक जीव सुखी रहे, स्वस्थ रहे।” आप भी चाहते हैं विश्व में शांति तो हमसे संपर्क करें।
जीमेल-: cosmicadvaiticconsciousism@gmail.com
